Sunday, 30 May 2021
Saturday, 29 May 2021
किसी भी फूल में निकहत न होगी.. frankhasrat /29/05/2021
किसी भी फूल में निकहत न होगी
मिरे रब की अगर रहमत न होगी
तुझे कुछ इश्क़ में हासिल न होगा
कि दिल में जब तिरे ज़ुर्रत न होगी
बुझेगी आग नफ़रत की नहीं गर
तो ये दुनिया कभी जन्नत न होगी
जहाँ लाशों पे इतनी सिसकियाँ हो
वहाँ इंसान की क़ीमत न होगी
है मेरे घर का अब माहौल ऐसा
बुरी आदत बुरी आदत न होगी
ये मज़हब की लड़ाई छोड़ दो तुम
हमारे मुल्क़ में दहशत न होगी
कटे हर रात सजदे में तुम्हारी
कि इसके बाद कुछ 'हसरत' न होगी
Monday, 24 May 2021
شاعری میں بھی سلطنت رکھی
ہم نے لفظوں میں ملکیت رکھی
شاعری میں بھی سلطنت رکھی
رب نے سب کچھ عطا کیا اس کو
جس نے سدا اچھی نیت رکھی
پیار حد سے کیا زیادہ پر
ہم نے اپنی بھی اہمیت رکھی
گھر میں دیوار پڑ گئی جیسے
باپ نے مر کے اس پہ چھت رکھی
میں نے بچوں کو بھی پڑھایا اور
جینے مرنے کی بھی بچت رکھی
وہ جو خود کو خدا سمجھتا تھا
اس نے میری بھی خیریت رکھی
ہوں میں ممنون اپنے دشمن کا
ایک اس نے ہی اصلیت رکھی
دل کو تو ٹوٹنا ہی تھا اک دن
اس نے جب نیو ہی غلط رکھی
اور باقی نہی کوئی حسرت
ایک بس چائے ہی کی لت رکھی
#Frankhasrat
کیا کہیں دفن بھی کرنے کی جگہ خالی ہے
آنکھ میں اشک اترنے کی جگہ خالی ہے
دل میں اک درد سنورنے کی جگہ خالی ہے
یہ گنہگار کہاں جائے کہ سب کے دل میں
بس فرشتوں کے ٹھہرنے کی جگہ خالی ہے
اب کوئی راہ کا پتھر نہیں ملنے والا
آؤ چلتے ہیں کہ چلنے کی جگہ خالی ہے
کوئی مجرم ہو گنہگار ہو قاتل ہو مگر
سب کے اک بار سدھرنے کی جگہ خالی ہے
پوچھتے رہتے ہیں آوارہ ہوئے خانہ بدوش
ملک میں کوئی ٹھہرنے کی جگہ خالی ہے
راہ میں کانٹے بچھا کر تو کچھ نہ پاؤ گے
پھول بکھراؤ بکھرنے کی جگہ خالی ہے
ایک بیمار نے مرتے ہوئے پوچھا حسرت
کیا کہیں دفن بھی کرنے کی جگہ خالی ہے
#frankhasrat
Sunday, 23 May 2021
क्षणिक सुख की प्राप्ती
*क्षणिक सुख की प्राप्ती* .......
प्रशंसा(तारीफ़) मिठाई के सामान है जो क्षणिक सुख प्रदान करता है और आसानी से मिल जाता है और इसके ज्यादा सेवन से गंभीर बीमारी भी हो सकती है परन्तु आलोचना(तनक़ीद) कड़वी नीम के मानिंद है। जिसके सेवन से इंसानी खून बीमारी मुक्त हो जाता है। कड़वी चीजे हमेशा बुरी नही होती। ठीक उसी तरह आलोचना भी क्षणिक दुःख तो देता है किंतु यह इंसान के सोचने समझने की क्षमता को बुनियादी तौर पर मज़बूत बना देता है। मौजूदा दौर में इंसान को क्षणिक सुख की लत लग गयी है। इस वक़्त हर किसी को दूसरों से ज्यादा बेशर्म होने की होड़ लगी है, लाइक कमेंट और थम्सअप वाले अंगूठे के लिए बड़े बड़े लोग साड़ी सलवार पहन के नाचने और लिपसिंग करने के लिये मजबूर हैं। ऐसा नही है कि ये लत जवानों तक महदूद है बल्कि बड़े, बुज़ुर्ग, स्वघोषित पीर, मौलवी, पण्डित, पुलिस आलाकमान भी इस बीमारी की जद में बराबर मुब्तिला(हिस्सेदार) हैं। मेरा मानना है कि जिसको ये लत लग जाती है उनको सिर्फ तारीफ सुनने से मतलब होता है चाहे वो कैसी भी हो। इस बीमारी ने अबतक न जाने कितनों को मौत के घाट उतार दिया फिर भी लोग समझने को तैयार नहीं वो तो भला हो सरकार का कि जिसने ऐसे वाहियात एप्लिकेशन पर पाबन्दी लगा दी। ऐप बैन होने के बाद तो कुछ लोग बौरा गए उनको दिन में तारे दिखने लगे बेचैनी ऐसी की सरकार को कोसने लगे लेकिन हमारी सरकार तो अच्छी बातों को सुनती ही नहीं यह तो फिर भी बुरी ही थी। हमारे नौजवान पीढ़ी के अंदर इस लत के बाद जो दूसरी लत है वो है नशा, मेरे हिसाब से तंबाकू और तारीफ़ में बहुत समानताएं हैं। दोनों इंसान को अंदर से खोखला कर देती हैं। दोनों के आदती को यही लगता है कि उन्हें इस चीज़ की लत(आदत) नहीं, और तारीफ़ और तम्बाकू दोनों एक साथ चलते हैं। तारीफ मानसिकता का पतन करती है तो नशा जिस्मानी ताकत को कम कर देता है फिर ऐसे व्यक्ति पर किसी बात का कोई असर नहीं होता। ऐसे व्यक्ति को समझाना बहुत मुश्किल हो जाता है। अधिकांश लोग कोशिश भी नहीं करते हैं कि इन खोखली और क्षणिक सुख देने वाली चीजों से बाहर निकल जाएँ। इससे पीड़ित व्यक्ति को तनक़ीद(आलोचना) ज़हर की तरह लगती है। ऐसे लोग आसानी से देखने को मिल जाते है क्योंकि ये हमारे आस पास ही मौजूद हैं और सीने में हवा भर कर कहते ये नशा तो आज चाहे आज छोड़ दे लेकिन यक़ीन करिये ये उतना ही मुश्किल है जितना अपनी जीभ से अपनी नाक को छूना। कुछ लोग तो हद ही कर देते हैं। जो यह कहते नज़र आ जाएंगे कि मुझे अपनी तारीफ़ सुनना बिल्कुल पसन्द नहीं, लेकिन मुझे नहीं लगता ऐसा कोई व्यक्ति होगा जिसे तारीफ़ पसन्द नहीं और यह स्वभाविक है ये होना भी चाहिए लेकिन जब किसी चीज़ की अति हो जाती है तो वह भयंकर बीमारी का रूप धारण कर लेती है। वहीं आलोचनाएं व्यक्तित्व को निखारने और संवारने का काम करती हैं, जैसे माली बाग़ में कटाई छटाई और सिंचाई करके एक सौन्दर्य बाग़ का निर्माण करता है। तनक़ीद भी ऐसी ही है।जैसे तारीफ़ क्षणिक सुख प्रदान करता है वैसे ही तनक़ीद क्षणिक दुःख। अब यह आप पर है कि आपको क्षणिक सुख चाहिए या सुखद जीवन। थोड़ी बहोत प्रशंसा भी ज़रूरी है हौसला अफ़ज़ाई के लिए लेकिन शर्त यह है कि इंसान उसका आदि न हो.......अगर आप भी इस मीठे ज़हर के आदि हो चुके हैं तो अपने अंदर से इस ज़हर को जितना जल्द हो सके दूर कर लें। और ख़ुद की तरक़्क़ी के लिए तनक़ीद का रास्ता अपना लें.........
@Frankhasrat
चंदौली-उत्तर प्रदेश
अब अली और राम मत कीजिए...... फ्रैंक हसरत
आप यूं कत्लेआम मत कीजिए
किस्सा ऐसे तमाम मत कीजिए
जो न हासिल हो अच्छे कामों से
आप उसमें तो नाम मत कीजिए
जब ज़रूरत हो याद कर लेना
सुबह, दोपहर, शाम, मत कीजिए
साहेब मज़बूरी में घर से निकला हूँ
आप मेरा चलान मत कीजिए
अब तो सब मर रहे हैं सड़कों पर
अब तो जीना हराम मत कीजिए
अब नहीं सुनना मौत की खबरें
अब कोई भी ऐलान मत कीजिए
सुनिए! एक काम कीजिए साहेब
आप कोई भी काम मत कीजिए
मुल्क़ आज़ाद हो चुका अपना
फिर से इसको गुलाम मत कीजिए
यह सियासत का खेल है इसको
हिन्दू-मुस्लिम बनाम मत कीजिए
हम समझने लगे हैं सब साहब
अब अली और राम मत कीजिए
जान हसरत की फिर भी हाज़िर है
भले दुआ सलाम मत कीजिए
FrankhasraT
29/04/2021
एक बस चाय ही की लत रख्खी.....फ्रैंक हसरत
हमने लफ़्ज़ों में मिल्कियत रख्खी
शायरी में भी सल्तनत रख्खी
रब ने सबकुछ अता किया उसको
जिसने अच्छी सदा नियत रख्खी
प्यार हद से किया ज़ियादा पर
हमने अपनी भी अहमियत रख्खी
घर में दीवार पड़ गयी जैसे
बाप ने मर के उसपे छत रख्खी
मैंने बच्चों को भी पढ़ाया और
जीने मरने की भी बचत रख्खी
वो जो ख़ुद को ख़ुदा समझता था
उसने मेरी भी ख़ैरियत रख्खी
हूँ मैं ममनून अपने दुश्मन का
एक उसने ही असलियत रख्खी
दिल को तो टूटना ही था इक दिन
उसने जब नींव ही ग़लत रख्खी
और बाक़ी नहीं कोई हसरत
एक बस चाय ही की लत रख्खी
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